1. आये बाहर यूं तो गुबार की तरह
आये बाहर यूं तो गुबार की तरह
हुए दर्ज़ वही फिर अशआर की तरह
बेसब्री से उठाया फिर रद्दी में रख दिया
हम पढ़े भी गए तो अख़बार की तरह
सुबह शाम सबको मुबारक कह कर
हर दिन मनाया है त्यौहार की तरह
हर शै में नफ़ा नुक़सान तोलते हैं
मुहब्बत भी की तो क़ारोबार की तरह
फ़ासले मिटते कैसे, हैसियत हमारी
आ गई है बीच दीवार की तरह
हो कैसे ‘अमित’ मुकम्मल ग़ज़ल
मक़ता फंस गया है हर बार की तरह
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