जाने कब कहाँ कैसे शुरुआत हुई याद नहीं, पर जब से होश संभाला शे’र-ओ-शायरी ने ध्यान खींचना शुरू कर दिया था | दोहे, चौपाई, श्लोक, छोटे छोटे जुमले, कोटेशन, नारे आदि लुभा रहे थे बड़ी बड़ी बातों व लंबी चौड़ी तकरीरों को मुख़्तसर व कम लफ़्ज़ों में समेटने में लुत्फ़ आने लगा था | दिग्गजों और उस्तादों की शाइरी से शरारत करना शग़ल बन गया | दोस्त बेतुकी तुकबंदियों पर ग़ौर करने लगे, मौके पर मौज़ूअ शे’र कहने पर महफ़िलों में पहचान बनने लगी | फिर क्या शौक़-ए-शायरी परवान चढ़ने लगी |
घर पर माहौल साहित्यिक था, घर पर ही बुज़ुर्गों की अदबी महफ़िलें आबाद थी, साहित्य की सुहावनी सतह कहीं न कहीं छू रही थी, शायद इसीलिए एक शायर धीरे-धीरे घर कर गया | ख़्याल ख़ुद-ब-ख़ुद शायरी में ढलने लगे | डायरी के पन्ने बयान औ’जज़्बात दर्ज करने लग गए |
बचपन से ही सियासी मुद्दों व सामाजिक सरोकार से जुड़े विषयों में दिलचस्पी आने लगी थी सो शायरी में भी इसकी झलक दिखने लगी | कहते हैं कि गर तबियत रुमानी नहीं तो शायरी मुमकिन ही नहीं | हर शायर रुमानी ख़्याल-ओ-तसव्वुर से लबरेज़ होता है, रुमानियत ख़ास मौजूं तो रही शायरी का पर समाजी सरोकार, इंसानीं रिश्तों ने भी ख़ासी जगह बना ली काग़ज़-ओ-इबारत में |
जैसा कि अमूमन होता है बचपन में पाठ्य-पुस्तकों से ज़्यादा अध्ययन कॉमिक्स का होता है | मुझे भी कॉमिक्स की दुनिया बहुत भाती थी, पर उसी दौरान संजीदा शायरी की किताबों ने भी मेरी बुक रैक में काफी जगह घेर ली | लगभग सभी बड़े शायरों के दीवान, मजमूयें व किताबें ख़रीदने और पढ़ने का शौक़ कॉमिक्स पढ़ने की उम्र से ही लग गया था जो बादस्तूर जारी है |
परवरिश हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू तीनों ज़बान के दरमियान हुई | घर पर माहौल स्तरीय हिंदी का था, तालीम अंग्रेजी माध्यम से हो रही थी पर उर्दू आब-ओ-हवा में घुली हुई थी, हिंदी-ओ-उर्दू आदरणीय व अज़ीज़ थीं तो अंग्रेजी ज़रूरत, पर रफ़्ता-रफ़्ता तीनों कुछ इस तरह रच बस गईं कि इनकी तक़सीमी नामुमकिन हो गई | इसलिए शायरी हुई तो हर रंग नज़र आने लगा | ख़ास तौर से हिंदी उर्दू सम्मिश्रण कुछ यूं हुआ कि शायरी किस ज़बान में है कहना मुश्किल हो गया | हक़ीक़त ये है कि हिंदी उर्दू में अंतर कर पाने में मैं ख़ुद को अक्षम पाता हूँ | मैं स्वयं हिंदी व उर्दू को एक दूजे का पर्याय मानता हूँ | हां इन दोनों भाषाओं के बेसिक लिपियों यानि रस्म-ए-ख़त में अंतर अवश्य है, जहाँ हिंदी देवनागरी लिपि में ज़्यादा प्रचलित है वहीँ नस्तालिक़ उर्दू की प्राथमिक लिपि मानी जाती है | परन्तु आज के दौर में उर्दू बाख़ूबी कामयाबी के साथ देवनागरी में लिखी, पढ़ी और समझी जा रही है | हिंदी उर्दू की क़वायद, व्याकरण में भी विशेष अन्तर नहीं हैं, तमाम शब्द अक्षरश: कॉमन हैं | हां, संस्कृत-निष्ठ हिंदी व अरबी-फ़ारसी युक्त उर्दू ज़रूर आम बोलचाल से दूर हैं |
यूं तो भाषा का काम जोड़ने का है परन्तु ये तोड़ने में ज्यादा कारगर साबित होती आई है सारी दुनिया में बड़ी वजह है झगड़े की | language is really a divisive factor सारा यूरोप भाषा के आधार पर ही बंटा है | वही हाल अपने मुल्क का भी है भाषा को लेकर कभी सामंजस्य नहीं बन पाया | आज सारे हिन्दुस्तान बल्कि तमाम मुल्कों में “हिंदी अंग्रेजी उर्दू” की मिलीजुली ज़बान ही बोली समझी जाती है, इनमें से किसी एक भाषा के अल्फाज़ हटाकर बोलना एक दिन भी मुमकिन ही नहीं है |
ये द्वन्द्व मेरे अंदर भी था कि भाषा की शुद्धता सर्वोपरि है या भावनाओं की तर्जुमानी | अक्सर देखा गया है कि भारी भरकम साहित्यिक शब्दों के बीच जज़्बात दम तोड़ देते हैं और बात अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाती शायद इसलिए मुझे मुश्किल यानि ग़ैर-प्रचलित लफ़्ज़ों से परहेज़ रहा | जो जबान हम बोलचाल में इस्तेमाल करते है उसी में शायरी भी की |
इस ग़ज़ल-संग्रह में यूं तो सौ चुनिंदा ग़ैर-पारम्परिक या ग़ैर-रवायती ग़ैर मुसलसल ग़ज़लें समायोजित की गईं हैं, पर पारम्परिक, रवायती ग़ज़लों की नाज़ुकता, कोमलता और ख़ुशबू बरक़रार रखने की कोशिश की गई है, इस कोशिश की कामयाबी, नाकामी का तबसरा, आकलन अब आप
पाठकों के हवाले | रवायती ग़ज़लों और ग़ैर-रवायती ग़ज़लों में फ़रक फ़क़त इतना है कि दूसरे में क़ाफियों और बहर आदि में उदारता बरती जाती है बहुत सख़्ती से पालन नहीं होता | ग़ैर-रवायती ग़ज़लों को आधुनिक, अपारम्परिक हिंदी ग़ज़ल भी कहते हैं | ग़ैर मुसलसल ग़ज़लें यानि वे ग़ज़लें जो किसी एक ख़ास विषय या मुद्दे पर न होकर मुख़्तलिफ़ ख़्यालों और भावनाओं को संजोती हैं | बहरहाल, इन जटिलताओं व पेचीदगियों को नज़र-अंदाज़ करते हुए ये मजमूआ आपकी पेश-ए-नज़र है |
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